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समग्र क्रांति का स्वप्न: अखिल भारतीय दलित महिला सम्मेलन

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निशा शेंडे
स्त्री अध्धयन विभाग अमरावती 'विश्वविद्यालय'में प्राध्यापिका
shende_nisha7@yahoo.com

20 जुलाई 1942 को पहला अखिल भारतीय दलित  महिला फेडरेशन की परिषद संपन्न हुई. यह वर्ष हम इसी परिषद की 75वीं वर्षगांठ मना रहे हैं. दलित महिलाओं की उन्नति, प्रगति सक्षमता की लड़ाई की शुरुआत इसी परिषद के माध्यम से हुई है. इस परिषद का वर्णन स्वर्ण अक्षरों  में किया जाना चाहिये. जिस जोशपूर्ण वातावरण में यह परिषद संपन्न हुई वहां से लेकर आज तक का दलित महिला आन्दोलन की उपलब्धियों के बारे में ऑडिट होना जरूरी है.

20 जुलाई 1942 को नागपुर में सुलोचनाबाई डोंगरे की अध्यक्षता में यह परिषद संपन्न हुई. इस परिषद की विशेषता यह थी कि परिषद में डॉ. बाबासाहब आंबेडकर स्वयं उपस्थित थे. दलित महिलाओं का अलग संगठन हो, यह इच्छा स्वयं डॉ. बाबासाहब आंबेडकर  की थी. ‘महिलाओं की प्रगति से ही समाज की प्रगति आंकी जा सकती है’ यह विचार डॉ. बाबासाहब आंबेडकर रखते थे. इसलिए व्यवस्था परिवर्तन की सोच, अस्पृश्य महिलाओं की उन्नति, उनका सम्मान प्राप्त करने हेतु उनका सार्वजनिक जीवन में आना महत्वपूर्ण था. सार्वजनिक आन्दोलन में महिलाओं की भागीदारी अपनी अहम् भूमिका निभाती है. और वह भागीदारी शेडयूल कास्ट की महिलाओं को करनी चाहिये. इस पर डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने भूमिका रखी कि  'अस्पृश्यता की वजह से जिन अस्पृश्य महिलाओं  का वजूद की खत्म हुआ था. उच्च ब्राह्मणवादी संस्कृति ने उनकी इतनी प्रताड़ना की थी कि वह स्वयं इंसान होना ही भूल गई थी. जानवर से भी बदतर जीवन शेडयूल कास्ट की महिलायें जी रही थी.'

मानवीय दृष्टिकोण या मानवीयता काअंश इस चातुर्य वर्ण  व्यवस्था में कहीं दूर दूर तक नजर नहीं आ रहा था. अस्पृश्य वर्ग की स्थिति बेहाल थी. ऐसी स्थिति में महिलाओं की स्थिति के बारे में हम सोच सकते हैं कि वह किन हालातों की और जातिवादी व्यवस्था की शिकार थी. आज उपलब्ध सभी भाषाओँ की दलित साहित्य में इस जीवन की वेदना प्रतिबिंबित हुई है. इस अवांछनीय सामाजिक परिस्थिति का अंग दलित समाज कैसे जीवनयापन कर रहा था? उसकी सोच-समझ, विचार करने की शक्ति ही हिंदू धर्म ने छीन ली थी. इस कठोर, घोर उपेक्षा तथा ब्राह्मनी हिंदू धर्म के वातावरण में दलित समाज की आंकाक्षा जागृत करने का श्रेय हम डॉ. बाबासाहब आंबेडकर को देते हैं.

इस क्रांतिकारी आंदोलन की शुरुआत महिलाओं ने की. लगभग पच्चीस हजार महिलायें इस परिषद में  रूप से सहभागी हुई थी. उनका उत्साह एक नई क्रांति का बिगुल बजा रहा था. यह एक क्रांतिकारी सम्मेलन था. दलित, शोषित, वंचित, पिछड़े समाज की महिलाओं की आवाज संपूर्णक्रांति की मांग करती नजर आ रही थी. यह परिषद अपने आप में दुनिया की ऐतिहासिक परिषद थी. इस परिषद में हुई घोषणा एवं मांगें महत्वपूर्ण थी. आज दलित महिलायें सामाजिक आंदोलन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी हैं. इस क्रियाशीलता की नींव 1942 की अखिल भारतीय दलित महिला सम्मेलन में डाली गई थी.


इस परिषद में उपस्थित महिलाओं काहौसला देखते बन रहा था. ये महिलायें अस्पृश्य समाज की, दलित, शोषित थी. यह जातिव्यवस्था तथा पितृसत्ता  से पीड़ित थीं. इन महिलाओं की परिस्थिति के बारे में पता चलता है, जो  काफी संघर्षपूर्ण था. आर्थिक, सामाजिक अस्पृश्यता के कारण विकट परिस्थितियों से जूझती ये महिलायें जातिभेद और पितृसत्ता का विरोध कर रही थी. इन महिलाओं की विशेषता यह थी कि ये केवल महिलाओं की परिस्थिति के बारे में ही सिर्फ नहीं सोच रही थी अपितु ये समाज में क्रांतिकारी बदलाव चाह रही थीं तथा डॉ. बाबासाहब आंबेडकर के आंदोलन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी थी.

भारत में 1975 का दशक स्त्रीमुक्ति का दशक जाहिर हुआ था. भारतीय स्त्रीमुक्ति का इतिहास 1975 से लिखना शुरू हुआ. पर 1942 में दलित महिलाओं ने स्त्रीमुक्ति आवाज बुलंद की थी. स्त्रीमुक्ति का आंदोलन सवर्ण जाति की महिलाओं के हाथ में था जहां केवल पारिवारिक हिंसा, बलात्कार तथा दहेज़ प्रथा के बारे में सोचा जा रहा था. जबकि दलित महिलायें पितृसत्ता, हिंदू धर्मव्यवस्था तथा जाति व्यवस्था को ललकार रही थी. महिलाओं का शोषण धार्मिक आधार पर हो रहा है, इस बात पर जोर डाल रही थी. मनुस्मृति की निंदा कर रही थी. इस परिषद में जाति, लिंगभाव तथा आरक्षण के प्रस्ताव संपन्न हुए.


संसदीय आरक्षण का यह अहम् मुद्दा इसपरिषद का  अंग था. महिलाओं में सक्षमता निर्माण करना, जाति तथा हिंसा के प्रश्न तथा हिंदूधर्मव्यवस्था त्याग करके डॉ. बाबासाहब आंबेडकर की राह पर चलना यह उनका महत्वपूर्ण कार्य बन चुका था. इसी परिषद के माध्यम से डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने दलित महिलाओं को सामाजिक तथा राजकीय आंदोलन से परिचित करवाया.

20 अप्रैल 1942 के परिषद केफलस्वरूप महिलाओं की विभिन्न जगहों पर सभा आयोजित होने लगी. जिनमें स्वतःस्फूर्त महिलायें भागीदारी करने लगी तथा वैचारिकता में महत्वपूर्ण सोच आने लगी. आज हम 33% महिला आरक्षण की मांग करते हुए आरक्षण के भीतर दलित महिलाओं के आरक्षण की अलग मांग कर रहे हैं.




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